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तो क्या अब दिल्ली पुलिस में रुकेंगे छोटे कामों के नाम पर करोड़ों के घोटाले

- April 17, 2024
तो क्या अब दिल्ली पुलिस में रुकेंगे छोटे कामों के नाम पर करोड़ों के घोटाले

तो क्या अब दिल्ली पुलिस में रुकेंगे छोटे कामों के नाम पर करोड़ों के घोटाले

-कामों के सत्यापन के लिए विशेष कमिटी का गठन किया गया

नगर संवाददाता

दिल्ली पुलिस में छोटे कामों के नाम पर होने वाले करोड़ों रुपयों के घोटालों पर लगाम लगाने के लिए विभाग एक्शन मोड में नजर आ रहा है। दरअसल इन कामों के सत्यापन और दिल्ली पुलिस की देनदारियों के सत्यापन के लिए हाल ही में एक विशेष टीम का गठन किया गया है। जो अब सभी डिस्ट्रिक्ट और यूनिट में होने वाले इन कामों का सत्यापन करेगी।

बताया गया है कि कमिटी का चेयरपर्सन अडिशनल सीपी विजिलेंस असलम खान को बनाया गया है। इनके अलावा कमिटी में तीन मेंबर अडिशनल सीपी (जनरल एडमिन) प्रमोद कुमार मिश्रा, डीसीपी जनरल मैनेजर (ऑपरेशन) दिल्ली पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन लिमिटिड (डीपीएचसीएल) आलाप पटेल और एग्जिक्यूटिव इंजीनियर (डीपीएचसीएल) भी हैं। ये सभी अब थानों, डीसीपी ऑफिस, बटालियन और दूसरी यूनिट में होने वाले कामों का सत्यापन करेंगे। जैसे अगर कोई काम किया जा रहा है तो काम शुरू होने से पहले और काम पूरा होने के बाद की तस्वीर मांगी जाएगी। इसके अलावा कामों के लिए पक्के बिल भी देने होंगे। कमिटी के लोग औचक निरीक्षण भी करेंगे। अब तक इन तमाम जगहों पर होने वाले इन छोटे कामों के लिए होने वाले खर्चे का कोई रेकॉर्ड नहीं होता था। यही कारण था कि ऑफिस में बैठे बाबू लोग अपनी मनमर्जी से बिल बनाकर पुलिस हेड क्वार्टर भेज देते हैं।

दिल्ली पुलिस पर 125 करोड़ से ज्यादा की देनदारी

पुलिस सूत्र का कहना है कि इन बिलों के चलते ही दिल्ली पुलिस पर मौजूदा समय में करोड़ों रुपये की देनदारी है। सूत्र ने दावा किया कि मोटे-मोटे तौर पर दिल्ली पुलिस पर मौजूदा समय में 125 करोड़ से ज्यादा की देनदारी है। उदाहरण देते हुए कहा, दिल्ली पुलिस के 15 जिलों में से हर एक पर करीब 7 से 8 करोड़ रुपये की देनदारी है। बाकी यूनिट और बटालियन की देनदारी अलग है। इसी से देनदारी का अंदाजा लगाया जा सकता है।

इसलिए होता है ज्यादा खर्च

एक डिस्ट्रिक्ट का उदाहरण देते हुए एक अन्य सूत्र ने बताया, यहां डीसीपी ऑफिस में कुछ साल पहले डीसीपी के कमरे और बाकी कमरों की मरमत में करीब दो करोड़ रुपये खर्च हुए थे। पुलिस पर अभी भी उस खर्च की देनदारी है। इसके बाद दूसरे डीसीपी यहां आए तो उन्होंने भी आकर अपने हिसाब से उसमें बदलाव करवा दिए। जिससे वहां और खर्चा हुआ। यही सिलसिला लगभर हर जिले में चलता है। अधिकारी बदलता है तो वहां मरमत या फर्नीचर बदलने के नाम पर इसी तरह से पैसा पानी की तरह बहाया जाता है।

क्या है रुपये खर्च करने का नियम

सीनियर पुलिस अधिकारी ने बताया कि कुछ साल पहले तक एक डीसीपी के पास किसी काम के लिए सिर्फ 15 हजार रुपये खर्च करने का अधिकार था। मगर इसे बढ़ाकर 1.50 लाख रुपये कर दिया गया था। अब इससे ऊपर डीसीपी को अगर 2.50 लाख रुपये खर्च करने होते हैं तो उसके लिए स्पेशल सीपी की मंजूरी लेनी होती है। वहीं अगर खर्च 2.50 लाख से ज्यादा का होता है तो उसकी मंजूरी पुलिस हेड क्वार्टर से लेनी होती है।

ऐसे दिखाया जाता है नियम को ठेंगा

अब आप सोच रहे होंगे कि जब 1.50 से ज्यादा कोई डीसीपी खर्च नहीं कर सकता तो करोड़ों रुपये का खर्च कैसे हुआ। सूत्र ने बताया, इसका भी तोड़ निकाल लिया गया है। किसी से मंजूरी ना लेनी पड़े इसलिए डीसीपी 1.49 लाख रुपये को ढेर सारे बिल बना देते हैं। जिससे नियम का उल्लंघन भी नहीं होता और सारे काम भी अपने हिसाब से हो जाते हैं।

एचएए और एचएजी पर सख्ती जरूरी

सूत्र ने कहा, हर जिले में एचएए और एचएजी ब्रांच होती है। यहां जो स्टाफ तैनात होता है वो ही सारा खेल कर रहे होते हैं। दिल्ली पुलिस का स्टैंडिंड ऑर्डर है कि इस ब्रांच में कोई दो साल से ज्यादा समय तक पोस्टेड नहीं रह सकता। मगर स्टाफ आठ-आठ साल से वहां तैनात है। डिस्ट्रिक्ट लेवल का कोई अधिकारी इन्हें हटाना भी चाहे तो वो इन्हें हटा नहीं सकता। इनकी सांठ-गाठ पुलिस हेड क्वार्टर में बैठे अधिकारियों से होती है। डिस्ट्रिक्ट में तैनात कोई अधिकारी इन्हें खर्च का हिसाब रखने के लिए कहता है जैसे कि किस थाने या ऑफिस में कब काम हुआ, उसमें कितना खर्च हुआ, कितने समय की गारंटी मिली आदि। अधिकारी के वहां तैनात होने तक तो उस रेकॉर्ड को रखा जाता है। मगर अधिकारी के जाते ही स्टाफ सारा रेकॉर्ड खत्म कर देते हैं। जबकि कंप्यूटर के जमाने में इस रेकॉर्ड को आसानी से रखा जा सकता है।

वेंडरों की भी है अपनी लॉबी

एक पुलिस सूत्र ने तो यह तक बताया कि इन छोटे कामों के जो वेंडर ठेके लेते हैं, उनकी भी अपनी अलग लॉबी है। इस लॉबी में क्षेत्रवाद और समाजवाद भी खूब देखने को मिल रहा है। अधिकारी अपने समाज या क्षेत्र से आने वाले लोगों को ही ठेके दिलवाते हैं। वेंडरों के इलाके तक बंटे हुए हैं। इन्हें ठेके दिलवाने के लिए अधिकारियों के आपस में विवाद तक सामने आए हैं। यही नहीं ये वेंडर अब डिस्ट्रिक्ट लेवल पर होने वाले अधिकारियों की पोस्टिंग भी अपनी मर्जी अनुसार करवा रहे हैं।

संज्ञान में आए कुछ घोटाले

दिल्ली पुलिस अकेडमी में करोड़ों रुपये का घोटाला सामने आया। एक बटालियन में खाने पर करीब 150 करोड़ रुपये खर्च हुए। आउटर जिले में करोड़ों के फर्जी बिल निकले, अडिशनल डीसीपी ने डीसीपी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इन मामलों की जांच भी हुई, मगर आखिर में इन्हें दबा भी दिया गया।

यह है उदाहरण

एक जिले में अडिशनल डीसीपी ने एक काम के लिए वेंडर से खर्च पूछा तो उसने 10 लाख रुपये बताया। अधिकारी ने ऑनलाइन वो काम 25 हजार में करवा लिया। वेंडर बाद में बोला काम तो उतने का ही था, मगर पैसा सब जगह बांटना होता है।

पुलिस हेड क्वार्टर के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए ही इस कमिटी का गठन किया गया है।